दिनांक 23-12-19 को गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा, के प्रांगण में राजनीति विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विभाग द्वारा एक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय "प्राचीन भारतीय राजवंशों की राजनीतिक प्रणालियाँ" रहा, जिस पर व्याख्यान देने के लिए राजनीति विज्ञान के अनेक महानुभाव एवं   शिक्षाविद  उपस्थित रहे। प्रथम दिवस, संगोष्ठी को चार सत्रों में विभाजित किया गया। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में प्रोफेसर भगवती प्रसाद शर्मा (कुलपति, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय),  प्रोफेसर कपिल कपूर (जे. एन. यू.), मुखय अतिथि  ने सेमिनार के थीम पर अपना  वक्तव्य दिया।
द्वितीय सत्र में प्रोफेसर श्री प्रकाश सिंह (दिल्ली विश्ववद्यालय) ने "आदिकव्य में राजधर्म की विद्यमानता" पर प्रकाश डालते हुए महाभारत एवं रामायण का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने  "रघुपति राघव राजा राम" सूक्ति की विस्तृत व्याख्या करते हुए आधुनिक युग में रामराज्य की संकल्पना प्रस्तुत की। तत्पश्चात प्रोफेसर दिलीप कुमार मोहांता (कल्याणी विश्वविद्यालय) ने अपने पृथक विषय "बौद्ध विहित साहित्य एवं सुशासन की नैतिक नींव " पर अपना उद्बोधन देते हुए पंडित दीन दयाल उपाध्याय के "एकात्म मानववाद" के सिद्धांत का उल्लेख किया। डॉ. भक्तिपुत्र रहताम ने भी अपने विषय "वैदिक काल में राजनीतिक प्रणाली" की विस्तृत व्याख्या करते हुए मनुस्मृति एवं वर्णाश्रम का अत्यंत सकारात्मक चित्रण किया। वर्तमान परपेक्ष्य में रहताम जी की ये व्याख्या नितांत प्रासंगिक है।
तृतीय सत्र में "लोकतांत्रिक मूल्य-प्राचीन भारत में स्मरण करने और अस्वीकार करने का अधिकार" विषय पर प्रकाश डालते हुए प्रोफेसर पवन शर्मा (मेरठ विश्वविद्यालय) जी ने "सर्वे भवंति सुखिनः , सर्वे संतु निरामया" का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया। श्री कल्याण रमन जी का "पल्लव वंश की राजनीतिक व्यवस्था" विषय पर व्याख्यान अत्यंत उललेखनीय रहा। "चोलों की राजनीतिक व्यवस्था" पर डॉ राम शंकर जी का उद्बोधन अत्यंत शिक्षाप्रद सिद्ध हुआ।  तृतीय सत्र की अध्यक्षता  प्रोफेसर एस. आर. भट्ट (पूर्व अध्यक्ष आई. सी. पी. आर.) ने "राजधर्म एवं कल्याणकारी राज्य" के विषय पर अपने बहुमूल्य विचार साझा किए।
चतुर्थ एवं अन्तिम सत्र में "मगध साम्राज्य की राजनीतिक व्यवस्था" विषय पर डॉ. एम. एल. राजा ने अपना विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया। तत्पश्चात डॉ. अर्चना सिन्हा जी ने अपने विशेष उद्बोधन में "चन्द्रगुप्त, बिन्दुसार, एवं अशोक" के कार्यकाल की राजनीतिक व्यवस्था का वर्णन प्रस्तुत किया। अन्तिम सत्र की अध्यक्षता पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर गुलाब चंद्र राम जायसवाल जी ने की।अपने विषय "मौर्य वंश की राजनीतिक व्यवस्था" को अत्यंत संक्षेप में समेटने के बाद श्री गुलाब चंद्र जी ने वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक संकट की ओर इशारा करते हुए लोगों से समालोचनात्मक अध्ययन करने एवं शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील की।
संगोष्ठी के दूसरे एवं अन्तिम दिन भी कई वरेण्य विभूतियों ने अपने वक्तव्य रखे। सभा के मुख्य अतिथि भारतीय राजनीति एवं इतिहास के जानकार एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. कृष्ण गोपाल जी। डॉ. साहब ने अपने डेढ़ घण्टे के पांडित्य पूर्ण उद्बोधन में वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति, एवं शिक्षा का विस्तृत वर्णन करते हुए लोगों से प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं पश्चिमी सभ्यता का तुलनात्मक अध्ययन करने का आवाहन। डाक्टर साहब ने इस विषय पर अधययन का आह्वान किया सभा में पधारे अन्य मनीषियों ने भी प्राचीन भारतीय राजनीति के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। संगोष्ठी का समापन मे प्रोफेसर भगवती प्रसाद शर्मा (कुलपति, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय) ने विचार रखते हुए उन्होंने विभिन्न विश्वविद्यालयों से पधारे अतिथियों से अपील की, कि वे अपने विभागों में प्राचीन भारतीय राजवंशों की राजनीतिक प्रणालियों पर एक पृथक विषय जोड़ा जाए, जिससे हमारे भावी कर्णधारों को हमारे देश की प्राचीन बहुआयामी राजनीति के बारे में पता चल सके। कायकम का समापन डाक्टर विवेक कुमार मिश्र विभागाध्यक्ष राजनीति विभाग  ने दोनों की रिपोर्ट प्रस्तुतु की तथा डाक्टर बन्दना पान्डे जी ने धन्यवाद ज्ञापन किया
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