शारदा विश्विद्यालय के स्कूल ऑफ़ लॉ में "वैकल्पिक विवाद समाधान: उभरते मुद्दे" पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया । इस समेलन में कई नामी गिरामी न्याय के क्षेत्र के विशिष्ठ व्यक्तियों ने भाग लिया जिनमे मुख्य हैं न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी, न्यायाधीश, सिंगापुर अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक न्यायालय और पूर्व न्यायाधीश  सर्वोच्च न्यायालय, प्रदीप कुमार श्रीवास्तव, न्यायाधीश, उच्च न्यायालय इलाहाबाद और प्रोफेसर पी. के. मल्होत्रा पूर्व लॉ सेक्रेटरी भारत सरकार  इत्यादि | स्कूल ऑफ़ लॉ, शारदा विश्वविधालय के सैकड़ो विधार्थियों ने इसमें भाग लिया |
        श्री ए.के. सीकरी का स्वागत शारदा विश्विद्यालय के प्रो. चांसलर वाई के गुप्ता ने किया । उन्होंने स्वागत करते हुए कहा की शारदा विश्वविधालय के लिए गर्व की बात है की देश के नामी गिरामी ख्याति प्राप्त न्याय विद हमारे परिसर में उपस्थित हुए हैं | उन्होंने श्री सिकरी तथा श्री श्रीवास्तव के बारे में कहा की ये दोनों नाम आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं | न्यायधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने गौतम बुद्ध नगर जिला न्यायालय से उच्य न्यायालय प्रमोशन होकर गए हैं |
          प्रोफेसर पी. के. मल्होत्रा ने सेमिनार में कहा  की माध्यस्थम्, सुलह एवं अनुकल्पी विवाद निप्टान विधि जो कि विवादों के निपटारे के लिए एक सशक्त पद्धति है , यह नया अधिनियम माध्यस्थम् अधिनियम को पूर्ण रूप से मजबूत बनाता है ताकि वह पक्षकारों द्वारा पेश किए गए विवाद का पूर्ण तथा अन्तिम फैसला कर सकें। मध्यस्थता से संबंधित कानून मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 में निहित है जिन्हे  25 जनवरी, 1996 को लागू किया गया
        न्यायमूर्ति श्री ए.के. सीकरी ने अपने  सम्बोधन कहा की  वैकल्पिक विवाद समाधान  घरेलू मध्यस्थता, अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता और विदेशी मध्यस्थ पुरस्कारों के प्रवर्तन के लिए भी प्रदान करता है। यह सुलह पर नई सुविधा को बदल देता है। मध्यस्थता की तरह, सुलह भी विवादों के निपटारे के लिए एक उपकरण के रूप में दुनिया भर में मान्यता प्राप्त कर रही है।  हालांकि 1940 का अधिनियम कानून का  अच्छा था, लेकिन इसे निंदनीय माना जाता था। मेसर्स  गुरु नानक फाउंडेशन  बनाम मेसर्स  रतन सिंह एंड संस  के केस में  माननीय सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि अधिनियम अप्रभावी था और जिस तरह से इस अधिनियम के तहत अदालतों में कार्यवाही की गई थी, उससे वकीलों को हंसी आती है और कानूनी दार्शनिक रोते हैं। ऐतिहासिक कारणों से भारत में  वैकल्पिक विवाद समाधान का महत्वपूर्ण स्थान है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य के संबंध में, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समुदाय ने महसूस किया कि अदालती मामले न केवल समयबद्धन बल्कि बहुत महंगे थे। विवादों को सुलझाने के लिए कई तरीके अपनाए गए। वे मध्यस्थता, सुलह, मध्यस्थता, बातचीत और लोक अदालत हैं
        स्कूल ऑफ़ लॉ के डीन प्रदीप कुलश्रेष्ठ ने सम्बोधित करते हुए कहा की वैकल्पिक विवाद समाधान के कई फायदे और नुकसान हैं। फायदों में से कुछ हैं- इसका उपयोग कम से कम किया जा सकता है, विवादास्पद मुद्दों की संख्या को कम कर देता है, इसकी लागत नियमित मुकदमेबाजी से कम होती है, यह अप्रभावी है, एडीआर का उपयोग वकील के साथ या बिना किया जा सकता है, यह अदालतों के काम के बोझ को कम करने में मदद करता है, आदि। । फायदे के अलावा वैकल्पिक विवाद समाधान की विभिन्न कमियां हैं, उनमें से कुछ हैं-  किसी एक पक्ष के लिए जोखिम की डिग्री भी ले सकता है, पार्टियों के बीच शक्ति का असंतुलन जो आमने-सामने की मध्यस्थता कर सकता है , एडीआर प्रक्रियाओं में कानूनी अधिकारों और मानव अधिकारों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है, लोकपाल अधिरचना बहुत धीमी हो सकती है, आदि।
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